अगर मैं थोड़ी धरती पाऊं…

आजकल मोहल्ले के बहुत सारे लोग PUBG छोड़कर पतंग उड़ाने लगे हैं। शाम को आसमान मानो परिंदों के लिए भी खाली नहीं रहता है। यह सब देखकर छोटू को भी पतंगबाजी करने की खुमार चढ़ी। बस फिर क्या था। उसने किसी तरह अपनी मां को मना कर पतंग मांझे और फिरकी का इंतजाम कर लिया। शाम से शुरू हो गई छोटू की पतंगबाजी। उसकी डग्गो पतंग अपनी पूंछ के साथ आसमान में फन उठाई नागिन की तरह लहराती हुई उड़ती रहती थी। उसके पड़ोस के मोहल्ले से भी काफी पतंगें उड़ा करती थीं। पड़ोस के सभी लड़के छोटू कि पतंग ईर्ष्या से देखा करते थे। वे सब अपनी – अपनी पतंगों को छोटू की पतंग से भिड़ाने के लिए खूब ढील दिया करते थे। इन दोनों के बीच लगभग बीच में श्यामराज अंकल ने कुछ जमीन छोड़ रखी थी। उस जमीन पर दो खूब लंबे शीशम लहराते रहते थे। वे इतने ऊंचे थे कि पीछे से आती सारी पतंगे उसमें लिपट कर रह जाती थीं। छोटू को इसका बड़ा फायदा मिलता था। उसकी पतंग आसमान में बादशाह की तरह सबसे ऊंचा उड़ा करती थी। उसे कोई छू भी नहीं पाता था। अगले ही सुबह छोटू ने श्यामराज अंकल की जमीन में कुछ आम की गुठलियां ले जाकर बो दी। छोटू को उन लंबे शीशमों से खूब लगाव हो गया था। वह हर सुबह आमों में पानी देने जाया करता था। पानी दे चुकने के बाद वहां आंखें उठाकर शीशम की सबसे ऊंची फुंगी को देखता। उसकी आंखें चमक जाती थी। फिर भी वह एक निगाह में उस पेड़ से लिपटी सारी पतंगों को देख लेना चाहता था। उन्हें देखकर वह इतना खुश हो जाता था कि बस दौड़कर शीशम के तने में लिपट जाता था। उसके हाथ शीशम के तनों को पूरा घेर भी नहीं पाते थे। इस तरह हर सुबह शीशम के कानों में वह शुक्रिया अदा करता था, और शाम में पूरे आसमान का राजा बना रहता। उसके आमों में भी पहले पांच लाल – कोमल पत्ते निकल आए थे। वह उन पत्तों को सूंघा करता और मन ही मन उन पर भविष्य में लगने वाले आमों की कल्पना करके खुश हो जाता था। वह बड़े जतन से उनकी सेवा कर रहा था। एक दिन वह सुबह उठकर आंख मलता हुआ ही बाहर निकला। उसके कदम सीधे अपने आम – शीशम से मिलने के लिए बढ़ने लगे। परंतु, वहां पहुंचकर उसे एक धक्का सा लगा। उसने देखा कि श्यामराज अंकल आए हुए हैं, और कुछ आदमियों से शीशम की ओर इशारा करके कह रहे हैं कि ‘ यही है वह पेड़। आप इन्हें देख लें फिर चलकर कीमत की बात कर लेंगे।’
आम की तरफ अपनी उंगली दिखाते हुए श्यामराज अंकल ने मजदूरों से कहा कि ‘ इन छोटे पौधों को भी उखाड़ देना, ज़रा। पता नहीं कहां से उग आते हैं?’ छोटू यह सब देखकर सदमे में था। अपने आमों पर वह अपना अधिकार समझता था, और शीशम तो पतंगबाजी में उसका साथ ही था। वह उसे यूं कटते नहीं देख सकता था। उसने खुद ही जाकर अपने आम के पौधे निकाल लिए किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। वह आम के पौधों को हाथ में लिए हुए ही शीशम के तने से जाकर लिपट गया। उसकी नजर नीचे पड़ी कुल्हाड़ी के ऊपर चली गई। कुल्हाड़ियां देखकर उसकी आंखें भर आईं। उसने सिसकते हुए ही शीशमों से ‘ गुड बाय ‘ कहा। फिर धीमे कदमों से चलते हुए वह घर पहुंचा। छोटू और उसका परिवार किराए पर रहता था। उन्होंने दो कमरे लिए हुए थे। कमरे न तो हवादार थे, और न ही उनमें कहीं से रोशनी आती थी । खैर, आम के पौधे लेकर छोटू घर पहुंचा। घर पहुंचते ही उसने बिना देर किए अपनी मां से कुछ प्लास्टिक के डिब्बे मांग कर उनमें आम लगा दिए। उन्हें वह घर के छत पर रख आया। छत से उसने शीशम की ओर देखा। उस पर कुल्हाड़ियों के वार शुरू हो गए थे। हर एक वार से शीशम की फुंगी तक हील जाती थी, और इधर छोटू भी हर एक वार के साथ सहम जाता था। शीशम रोता हुआ दिखाई दे रहा था। उसे ऐसा लग रहा था मानो शीशम उससे कह रहा हो कि ‘ मैं तो अब नहीं बच सकता, दोस्त। हो सके तो इन आम के पौधों को बचा लेना।’
छोटू की एक घुटी हुई आवाज निकल आई ‘ जरूर, मैं इन्हें कुछ नहीं होने दूंगा।’
इतना कहकर वह नीचे चला गया। उस शाम से उसने पतंग नहीं उड़ाई है। एक – दो रोज़ के बाद उसके मकान मालिक ने आम के पौधों को भी उखाड़ कर फेंक दिया। वह बड़बड़ाते हुए नीचे उतर रहे थे कि ” सब हमार छतवा में सीलन करवाने का ठान रखा है “। अंततः छोटू कुछ भी न कर सका।

एक टुकड़ा आसमान और एक टुकड़े जमीन की ख्वाहिश लिए ही न जाने कितने छोटूओं की सारी जिंदगी पलकों के नीचे से गुजर जाती है। कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखते हैं :

बहुत दिनों से सोच रहा था,
थोड़ी धरती पाऊं,
उस धरती में बाग बगीचा
जो हो सके लगाऊं ।

खिले फूल – फल, चिड़िया बोले,
प्यारी खुशबू डोले,
ताजी हवा जलाशय में,
अपना हर अंग भिंगो ले।

लेकिन एक इंच धरती भी,
कहीं नहीं मिल पाई,
एक पेड़ भी नहीं,
कहे जो मुझको अपना भाई।

आज कल जब मैं छत से पेड़ों को कटते और उनके जगहों पर नए घर बनते हुए देखता हूं, तो दिल कहता है कि लिखूं ,
लिखूं कि अपने सामने हैं दो राहें,
बाएं में आग है और दाहिने में खाई है,
लिखूं कि अब जंगल की ओर लौट चलें,
जो इन राहों के बीचोबीच ही उग आई है।

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